उलूक टाइम्स: कमजोर
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सोमवार, 8 अप्रैल 2024

‘उलूक’ थे और वो थे बस कुछ बेवकूफों में गिने जाते थे मगर मशहूर थे

 

किताबें तो एक सी थी लिखा भी एक सा था
शायद पढ़ाने वाले ही कुछ और थे
लिखे हुए पन्नो पर हस्ताक्षर थे एक समय के ही थे
घड़ी पहने लोग कोई और थे

सिहासन नहीं था कहीं भी ना ही था राजा कहीं
समझाने वाले थे मगर कहीं और थे
समझ अपनी थी अपनी उनकी समझ उनकी ही थी
और थे कुछ चोर मगर चोर थे

हम भी देखते थे चोर थे वो भी देखते थे चोर थे
चोर ही थे मगर जो सच में चोर थे
चोर कहाँ चोर होते थे जहां सब तरफ सुने थे बस मोर थे
मोर थे हर तरफ बस मोर थे

चोर थे ही जरूरत बन चुकी थी इस तरफ थे बेकार थे
उस तरफ आये इक शोर थे
चोर होना ही जरूरी था जो नहीं हो पा रहे थे
सच में बेचारे थे बहुत ही कमजोर थे

चोर होना था यही सन्देश होना था मशहूर होना था
नहीं कहना था बस मजबूर थे
‘उलूक’ की किताबें थीं बंद थीं दिमाग था मगर बस था
वो कुछ  बेवकूफों में गिने जाते थे मगर मशहूर थे |

चित्र साभार: https://www.shutterstock.com/

शनिवार, 22 मार्च 2014

शब्दों के कपड़े उतार नहीं पाने की जिम्मेदारी तेरी हो जाती है



हमाम में आते 
और जाते रहना
बाहर आकर कुछ और कह देना
आज से नहीं सालों साल से चल रहा है

कमजोर कलेजे 
पर
खुद का 
जोर ही नहीं चल रहा है

थोड़ी सी हिम्मत 
किसी रोज  बट भी कभी जाती है

बताने की बारी 
आती है तो
गीले हो गये पठाके की तरह फुस्स हो जाती है

नंगा होना हमाम 
के अंदर
शायद 
जरूरी होता है हर कोई होता है
शरम थोड़ी सी भी नहीं आती है

कपड़े पहन कर 
पानी की बौछारें
वैसे भी कुछ कम कम ही झेली जाती हैं

बहुत से कर्मो 
के लिये
शब्द 
ही नहीं होते कभी पास में

शब्द के अर्थ 
होने से भी
कोई बात समझ में आ जानी
जरूरी नहीं हो जाती है

सभी नहाते हैं 
नहाने के लिये ही
हमाम बनाने 
की जरूरत हो जाती है

शब्दों को नँगा 
कर लेने जैसी बात
किसी से 
कभी भी कहीं भी
नहीं कही 
जाती है

हमाम में 
नहाने वाले से
इतनी बात जरूर सीखी जाती है
खुद कपड़े उतार भी ले कोई सभी अपने

'उलूक'
आ ही 
जानी चाहिये
इतने सालों में तेरे खाली दिमाग में

बात को
कपड़े 
पहना कर बताने की कला
बिना हमाम में रहे और नहाये
कभी 
भी 
नहीं किसी 
को आ पाती है ।

चित्र साभार: http://clipart-library.com/

शुक्रवार, 7 जून 2013

क्या आपने देखी है/सोची है भीड़



भीड़ देखना 
भीड़ सोचना
भीड़ में से गुजरते हुऎ भी भीड़ नहीं होना
बहुत दिन तक नहीं हो पाता है

हर किसी के 
सामने 
कभी ना कभी कहीं ना कहीं 
भीड़ होने का मौका जरूर आता है 

कमजोर दिल 
भीड़ को देख कर अलग हो जाता है
भीड़ को दूर से देखता जाता है 

मजबूत दिल 
भीड़ से नहीं डरता है कभी 
भीड़ देखते ही भीड़ हो जाता है 

भीड़ कभी 
चीटियों की कतार नहीं होती 
भीड़ कभी बीमार नहीं होती
भीड़ में से गुजरते हुऎ
भीड़ में समा जाना 
ऎसे ही नहीं आ पाता है

भीड़ का भी 
एक गुरु होता है
भीड़ बनाना भीड़ में समाना
बस वो ही सिखाता है

भीड़ेंं तो बनती 
चली जाती हैं 
भीडे़ंं सोचती भी नहीं हैं कभी
गुरु लेकिन सीढ़ियाँ चढ़ता चला जाता है

भीड़ फिर कहीं 
भीड़ बनाती है 
गुरू कब भीड़ से अलग हो गया
भीड़ की भेड़ को कहाँ समझ में आ पाता है ।

चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/