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रविवार, 21 जनवरी 2018

‘बीस साल तक आपके घर का कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी दीमक’ : जब इस तरह के समाचार को देखते हैं

कभी
अखबार
को देखते हैं

कभी
अखबार
में छपे
समाचार
को देखते हैं

पन्ने
कई होते हैं
खबरें
कई होती हैं 

पढ़ने वाले
अपने
मतलब के

छप रहे
कारोबार
को देखते हैं

सीधे चश्मे से
सीधी खबरों
पर जाती है
सीधे साधों
की नजर

केकड़े कुछ
टेढ़े होकर

अपने जैसी
सोच पर
असर डालने
वाली
टेढ़ी खबर
के टेढ़े
कलमकार
को देखते हैं

रोज ही कुछ
नया होता है
हमेशा खबरों में

आदत के मारे
कुछ पुरानी
खबरों
से बन रहे

सड़
रही खबरों
के अचार
को देखते हैं

‘हिन्दुस्तान’
लाता है
कभी कभी
कुछ
सदाबहार खबरें

कुछ
आती हैं
समझ में
कुछ
नहीं आती हैं 

समझे बुझे
ऐसी खबरों
के खबरची
खबर छाप कर
जब अपनी
असरदार
सरकार को
देखते हैं

‘उलूक’
और
उसके

साथी दीमक
आसपास की
बाँबियों के

चिलम
लिये हाथ में

फूँकते
समय को

उसके धुऐं से
बन रहे छल्लों
की धार
को देखते हैं ।

चित्र साभार: दैनिक ‘हिंदुस्तान’ दिनाँक 21 जनवरी 2018

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

आग लगा दीजिये शराफत को समझ में आ गये हैं बहुत शरीफ हैं बहुत सारे हैं हैं शरीफ लोग

कुछ में
बहुत कुछ
लिख देते हैं
बहुत से लोग

बहुत से लोग
बहुत कुछ
लिख देते हैं
कुछ नहीं में भी

कुछ शराब
पर लिख देते
हैं बहुत कुछ
बिना पिये हुऐ भी

कुछ पीते हैं शराब
लिखते कुछ नहीं हैं
मगर नशे पर कभी भी

कुछ दूसरों
के लिखे को
अपने लिखे में
लिख देते हैं

पता नहीं
चलता हैं
पढ़ने वाले को

बहुत बेशरम
होते हैं बहुत से
बहुत शरीफ
होते हैं लोग

चेहरे कभी
नहीं बताते
हैं शराफत
बहुत ज्यादा
शरीफ होते हैं
बहुत से लोग

दिमाग घूम
जाता है
‘उलूक’ का
कई बार

उसकी पकाई
हुई रोटियाँ
अपने नाम से
शराफत के
साथ जब
उस के सामने
से ही सेंक
लेते  हैं लोग ।

चित्र साभार: http://www.clker.com

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

तेरह सौ वीं बकवास हमेशा की तरह कुछ नहीं खास कुछ नजर आये तो बताइये


तेरह 
के नाशुक्रे
नामुराद अंक
पर ना जाइये

इतनी तो
झेल चुके हैं
पुरानी कई

आज की
ताजी नयी पर
इरशाद फरमाइये

कहने का
बस अन्दाज है
एक नासमझ का
जनाब अब तो
समझ ही जाइये

हिन्दी और
उर्दू से मिलिये
इस गली की
इस गली में

उस गली की
अंगरेजी
उस गली में
रख कर आइये

किसलिये
बतानी हैं
दिल की
बातें किसी को

छुपाने के लिये
कुछ छुपी
बातें बनाइये

तलबगार
किसलिये हैं
मीठे के इतने
नमकीन खाइये


निकल लीजिये
किसी पतली गली में
बेहोश हो कर गिर जाइये


छुपती नहीं है
दोस्ती दुश्मनी
बचिये नहीं
खुल के सामने आइये

मरना तो
सब को है इक दिन
कुछ इस तरह से
या उस तरह से


मरवा दे
कोई इस से पहले
मौका ना देकर
खुद ही मर जाइये


‘उलूक’
तेरहवीं करे
तेरह सौ वीं
बकवास
की जब तक

नई
इक ताजी
खबर की
कबर पर
आकर

मुट्ठी भर
धूल उड़ाइये।

चित्र साभार: https://www.lilly.com.pk/en/your-health/diabetes/complications-of-diabetes/index.aspx

रविवार, 14 जनवरी 2018

अलाव में रहे आग हमेशा ही सुलगती हुई इतनी लकड़ियाँ अन्दर कहीं अपने कहाँ जमा की जाती हैं



लकड़ियों
से उठ रही
लपटें
धीरे धीरे
एक छोटे से
लाल तप्त
कोयले में
सो जाती हैं

रात भर में
सुलग कर
राख हो चुकी
कोयलों से
भरी सिगड़ी

सुबह बहुत
शांत सी
नजर आती है

बस यादों में
रह जाती हैं
ठंडी सर्द शामें
जाड़ों के
मौसम की

धीमे धीमे
अन्दर कहीं
सुलगती
हुई आग
बाहर की
आग से जैसे
जान पहचान
लगवाना
चाहती हैं

लकड़ी
का जलना
आग धुआँ
और
फिर राख

इतनी सी
ही तो
होती है
जिन्दगी

फिर भी
सिरफिरों की
आग से खेलने
की आदत
नहीं जाती है

कुरेदने में
बहुत मजा
आता है
बुझी हुई
राख को

जलती
तेज लपटों
से तो दोस्ती
बस दो स्केल
दूर से ही
की जाती है

कहाँ सोच
पाता है
आदमी
एक अलाव
हो जाने का
खुद भी
आखरी दौर
में कभी

अन्दर
जलाकर
अलाव
ताजिंदगी

ना जाने
बेखुदी में
कितनी कितनी
आगें पाली
जाती हैं

‘उलूक’
कुछ भी
लिख देना
इतना आसान
कहाँ होता है
किसी भी
बात पर

फिर भी
किसी की
बात रखने
के लिये
बात कुछ
इस तरह भी
अलाव में
अन्दर
सेक कर
बाहर पेश
की जाती हैं ।

चित्र साभार: http://www.clipartpanda.com

बुधवार, 10 जनवरी 2018

क्या लिखना है इस पर कुछ नहीं कहा गया है हिन्दी सीखिये रोज कुछ लिखिये गुरु जी ने वर्षों पहले एक मन्त्र दिया है

वृन्द के दोहे
‘करत करत
अभ्यास के
जड़मति
होत सुजान’
के
याद आते ही
याद आने शुरु
हो जाते हैं


हिन्दी के
मास्टर साहब
श्यामपट चौक
हिन्दी की कक्षा

याद आने
लगता है
‘मार मार कर
मुसलमान
बना दूँगा मगर
हिन्दी जरूर
सिखा दूँगा’
वाली उनकी
कहावत में
मुसलमान
शब्द का प्रयोग

और जब भी
याद आता है
उनका दिया
गुरु मन्त्र

‘लिख
कर पढ़
फिर पढ़
कर समझ’

जड़मति
‘उलूक’
फिर से लिखना
शुरु हो जाता है

लिखना
रोज का रोज
वो सब जो
उसकी समझ में
नहीं आ पाता है

लिखते लिखते
पता नहीं कितना
कितना लिखता
चला जाता है

ना जड़ मिलती है
ना मति सुधरती है
ना ही मुसलमान
हो पाता है

मार पड़ने का
तरीका बदलता
चला जाता है

मार खाता है
लिखता है
लिख कर
चिल्लाता है

फिर भी
ना जाने क्यों
ना हिन्दी ही
आ पाती है

ना
समझ ही
अपनी समझ
को समझ
पाती है

एक पन्ने के
रोज के
अभ्यास को
पढ़ने के लिये

कोई
आता है
कोई नहीं
आता है

कहाँ पता
हो पाता है
यही
‘करत करत
अभ्यास के
जड़मति
होत सुजान’

उससे
पता नहीं
कब तक
कितना कितना
और ना जाने
क्या क्या आगे
लिखवाता है ?

चित्र साभार: http://www.clipartguide.com

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